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पंडित वीरभद्र मिश्र की स्मृति

(पत्रकार/सम्पादक हेमंत शर्मा के वाल से )

बनारस के वैश्विक हीरो मंहत वीरभद्र मिश्र की आज पुण्यतिथि है। उनको गए आठ साल हो गए।तब उनकी याद में लिखा यह लेख। उनकी स्मृति को प्रणाम।

लोकमंगल के संवाहक

​वे मंदिर के निरे महंत नहीं थे। चार सौ साल से चली आ रही संकटमोचन संगीत परंपरा के संवाहक भी थे। तुलसीदास की नवधा भक्ति में निष्णात थे। वे अखाड़े के पहलवान थे। बिगड़ते पर्यावरण को बचाने के वैश्विक हीरो थे। विलक्षण गंगा-प्रेमी थे। चालीस साल से गंगा की सफाई के भागीरथ प्रयत्न में लगे थे। उनका नाद-ज्ञान अद्भुत था। बनारस के संकटमोचन मंदिर के महंत वीरभद्र मिश्र बी.एच.यू में हाइड्रॉलिक इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर भी रहे। क्या किसी एक व्यक्ति में इतने आयाम हो सकते हैं? अब तक इन सवालों का जवाब हाँ में था। पर गए हफ्ते महंतजी के निधन के बाद अब यह संयोग दुर्लभ॒होगा।

महंतजी के न रहने से बनारस-अस्सी-गंगा-तुलसीदास-संगीत का सेतु टूट गया है, जो गए चालीस साल से प्रकाशस्तंभ की तरह सक्रिय था। अस्सी, तुलसी और गंगा इस शहर के तीन अनिवार्य तत्त्व हैं। गंगा तो जीवन रेखा है। तुलसीदास ने अपने जीवन का उत्तरार्ध इसी घाट पर बिताया, जहाँ महंतजी रहते थे। किष्किंधाकांड के बाद सारी रामचरितमानस तुलसीघाट पर ही लिखी गई। कहानीकार काशीनाथ सिंह के मुताबिक ‘अस्सी अष्टाध्यायी है तो बनारस उसका भाष्य।’ बनारस के जिस घाट पर बैठकर तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखी थी, महंतजी ने उसी घाट से चालीस साल पहले गंगा पर खतरे का शंखनाद किया था। संकटमोचन फाउंडेशन बनाकर ‘स्वच्छ गंगा अभियान’ चलाया। यह वह दौर था, जब बनारस में डीजल रेल इंजन कारखाना लगा था। उसका कचरा गंगा में गिरता था, जिस कारण बनारस की गंगा में पहली दफा प्रदूषण से मछलियाँ मरी थीं। यह गंगा पर आधुनिकीकरण का पहला हमला था।

कोई पाँच महीने पहले जब मैं महंतजी से आखिरी बार मिला तो वे गंगा के लिए लड़ते-लड़ते थके नजर आ रहे थे। ‘अब आप ही लोग बचाइए गंगाजी को। बनारस के इतिहास में पहली बार हुआ है कि गंगा ने पाट (किनारा) छोड़ दिया है। कोई ये बताने को तैयार नहीं है कि डेढ़ हजार करोड़ बहाने के बाद गंगा में प्रदूषण घटने के बजाय बढ़ कैसे गया।’ अस्थमा से परेशान महंतजी बहुत कारुणिक अंदाज में कहते रहे—‘सरकार कुछ नहीं कर सकती। पर गंगा में रोज गिरनेवाले तीन हजार मिलियन लीटर सीवेज को तो रोक सकती है।’ महंतजी इस चिंता को लेकर चले गए। लेकिन उनके सवाल जिंदा हैं, जिसका जवाब शायद केंद्रीय गंगा प्राधिकरण के पास भी नहीं है।

गंगा पर आसन्न खतरे को उन्होंने सबसे पहले पहचाना था। राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान 1986 में बनाया। पर महंत वीरभद्र मिश्र ने ‘स्वच्छ गंगा अभियान’ 1965 से ही शुरू कर दिया था। यही वजह थी, सन् 2000 के पृथ्वी सम्मलेन में राष्ट्रपति क्लिंटन ने उन्हें ‘मैन ऑफ साइंस ऐंड फेथ’ कहकर पुकारा था। 1992 के ‘रियो डी जिनेरियो’ के पृथ्वी सम्मलेन में उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया था। 1999 में ‘पत्रिका’ मैगजीन ने उन्हें दुनिया के उन पाँच लोगों में रखा था, जिन्हें ‘टाइम’ ने ‘हीरो ऑफ प्लेनेट’ का खिताब दिया था। बनारस का संकटमोचन मंदिर गोस्वामी तुलसीदास का बनवाया हुआ है। वीरभद्र मिश्र उसके महंत थे। वे तुलसी अखाड़े के भी प्रमुख थे। तुलसीदास ने धर्म की रक्षा के लिए यह अखाड़ा बनाया था।

ज्यादातर लोग महंतजी को सिर्फ संकटमोचन मंदिर का महंत समझते थे। धोती-कुरतावाला इंजीनियरिंग का प्रोफेसर कोई बिरला मिलेगा, जिसकी ऐसी निष्ठा गंगा और संगीत में भी हो। वे अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे। क्या प्रोफेसरी, संगीत और पहलवानी का कोई रिश्ता हो सकता है? वे कभी पर्यावरण के ‘वाच डॉग’ दिखते तो कभी इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ। कभी गंगा को बचाने के लिए आंदोलनकारी दिखते तो कभी संगीत और परंपरा को जीनेवाला तुलसी के लोकमंगल का संवाहक। जब ‘ध्रुपद’ परंपरा खत्म सी हो रही थी तो महंतजी ने डागर बंधुओं के साथ तुलसीघाट पर ध्रुपद मेले का आयोजन शुरू किया। आज तुलसीघाट पर चलनेवाला ध्रुपद मेला देश में संगीत का सालाना अकेला उत्सव है, जहाँ पाँच रोज तक सिर्फ ध्रुपद गायकी होती है।

काशी में संगीत की परंपरा तुलसीदास ने शुरू की थी। तुलसी राग, ताल, अलाप जानते थे। विनयपत्रिका और कवितावली में उन्होंने रागों के आधार पर ही भजन लिखे। फिर इसे गवाने के लिए मंदिर में संगीत समारोह शुरू किए। यह मंदिर संगीत बाद में संकटमोचन संगीत समारोह बना। पं. जसराज, शिवकुमार शर्मा, हरिप्रसाद चौरसिया, बिरजू महाराज, सितारा देवी, किशन महाराज, गुदई महाराज, जाकिर हुसैन ऐसा कोई संगीतकार नहीं, जो यहाँ गा-बजा स्वयं को धन्य न समझता॒हो।

महंतजी इतने सारे अभियान उस अस्सी से चला रहे थे, जो बनारस का सबसे विकट मुहल्ला है। यहाँ बड़े से बड़ा आदमी आ जाए, लोग उसे खदेड़ देते हैं। तुलसीदास से नंदितादास तक सबको यहाँ से खदेड़ा गया। तुलसी को पंडितों ने इसीलिए भगा दिया, क्योंकि वे लोकभाषा में रामचरित कह रहे थे। नंदितादास को उनकी फिल्म ‘वाटर’ के लिए भगाया गया। कवि केदारनाथ सिंह कहते हैं—‘अस्सी पर ‘सर्वाइव’ करना ही महान् होने के लक्षण हैं।’ हालाँकि यह जुमला वे नामवर सिंह के लिए कहते रहे हैं। नामवर सिंह तथा महंतजी एक ही मुहल्ले में आमने-सामने रहते थे।

महंतजी के इस बहुआयामी व्यक्तित्व के पीछे दुश्वारियाँ भी कम नहीं थीं। वे तीन साल के थे, तभी पोलियो हो गया। एक पैर खराब। वोकल कॉर्ड पर भी असर था। परंपरा को गंगा की तरह सतत प्रवाहमान माननेवाले वे वैज्ञानिक संत थे। महंतजी अब नहीं रहे। पर जब भी गंगा तुलसीघाट की सीढि़यों से टकराएगी, उसे अपने लिए लड़ते इस महानायक का संघर्ष जरूर याद आएगा।उन्हें प्रणाम।

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