Tuesday, March 5, 2024
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गोस्वामी तुलसीदास जी की 525वीं जयंती पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आयोजित की गई राष्ट्रीय संगोष्ठी।

गोस्वामी तुलसीदास जी की 525वीं जयंती के अवसर पर ज्योतिर्गंगा न्यास और भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए मुख्य वक्ता अखिल भारतीय सन्त समिति के महामन्त्री स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती जी ने कहा कि तुलसीदास जी को दलित और स्त्री विरोधी साबित करने का प्रयास करने वाले लोग राजनीति से प्रेरित तुलसीदास जी ने सेतु के समान समाज को एक किया। सियाराम मय सब जग जानी के उद्घोष के साथ शैव-वैष्णव, द्वैत-अद्वैत सहित समाज में व्याप्त दूरियों को मिटाया।



मुख्य अतिथि उ. प्र. सरकार के मन्त्री श्री दयाशंकर मिश्रा ‘दयालु’ ने कहा कि काशी की गलियों में घूमते हुए हम सबने तुलसीदास जी को जाना है। काशी की गलियों में तुलसीदास जी के तमाम पदचिह्न बिखरे पड़े हैं। तुलसीदास जी ने काशी में हनुमान जी के 11 मन्दिर स्थापित किये थे। ये मन्दिर आज भदैनी, शिवाला, हनुमानघाट, नीचीबाग, कर्णघण्टा, दारानगर, हनुमान फाटक, प्रह्लाद घाट और मीरघाट मुहल्लों में स्थित हैं।


ज्योतिर्गंगा न्यास के सचिव गोविन्द शर्मा ने कहा कि मुस्लिम आक्रान्ताओं के द्वारा छिन्न-भिन्न की गई काशी को तुलसीदास जी ने नवजीवन दिया। काशी का वर्तमान स्वरूप उन्हीं की देन है।



अध्यक्षता करते हुए संकट मोचन मन्दिर के महन्त प्रो. विश्वम्भर नाथ मिश्र ने कहा कि वर्तमान समय में तुलसीदासजी पर बहुत सारे लोग आक्षेप कर रहे हैं लेकिन जनमानस के हृदय से तुलसीदास जी को कोई मिटा नहीं सकता। जीवन के सारे प्रश्नों का समाधान हमें रामचरितमानस में प्राप्त होता है।

विषय प्रस्थापित करते हुए श्री काशी विद्वत्परिषद् के महामन्त्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने कहा कि जनसाधारण की भाषा में रामचरितमानस की रचना कर तुलसीदास जी ने हिन्दू संस्कृति की रक्षा की। सभी शास्त्रों के सारभूत रामचरितमानस को समाज में वेदों के समान दर्जा प्राप्त है।

उज्जैन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि इस देश की माताएँ यदि रामकथा को आत्मसात कर लें तो उनके घर राम ही जन्म लेंगे, कभी रावण पैदा नहीं होगा। इसलिए शिव ने पहली बार रामकथा माँ पार्वती को ही सुनाई।

सी. एम. एंग्लो बंगाली इन्टर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. विश्वनाथ दूबे ने कहा कि तुलसीदास कवियों में सर्वश्रेष्ठ कवि थे। रामचरितमानस के अतिरिक्त कई अन्य ग्रन्थों की रचना भी तुलसीदास जी ने काशी में की थी। तुलसीदासजी ने तुलसीघाट की प्रसिद्ध स्थल रामलीला समेत कई रामलीलायें प्रारम्भ कराई थी। जिनका आज भी मंचन हो रहा है।युवाओं के लिए उन्होंने कई व्यायामशालायें व अखाड़े भी स्थापित किये थे।

अतिथियों और प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापन मुख्य आयोजक भारत अध्ययन केन्द्र के निदेशक प्रो. सदाशिव द्विवेदी ने किया।

सञ्चालन रामकथा की प्रख्यात प्रवक्ता भक्ति किरण शास्त्री ने किया।

अतिथियों का स्वागत संयोजक उत्कर्ष द्विवेदी सहित भानुप्रताप सिंह, बालमुकुन्द, अभिषेक सिंह ने किया।

डॉ. जे. एस. त्रिपाठी, डॉ गीता शास्त्री, प्रो. देवेन्द्र मोहन, रजत जायसवाल, प्रो. सी. बी. झा, प्रो. ओमप्रकाश, डॉ. आनन्द पाण्डेय, आनन्द शर्मा, साहिल सोनकर की प्रमुख रूप से उपस्थिति रही।

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